बचपन का प्यार। Love story by Amit Kumar Gautam कहानियां रायबरेली की

     कमरे के बाहर काफी शोरगुल हो रहा था। सब लोग नई नवेली दुल्हन को अपने-अपने सुंदरता के पैमाने में नाप रहे थे। किसी को उसके लम्बे बाल पसंद आये तो किसी को उसके नैन-नक्श। कमरे के अंदर सज-संवर कर फूलों की सेज पर बैठी सुलोचना सबकी बातें सुनकर मुस्कुरा रही थी। परम्परागत शादी के कारण सुलोचना काफी थक चुकी थी लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। 



     आज  सुलोचना की जिंदगी का काफी अहम दिन था। सुलोचना बचपन से काफी सुशील और समझदार थी। अपने घरवालों की बात का हमेशा उसने मान रखा और कभी किसी भी बात का पलटकर जवाब नहीं दिया। सुलोचना की यही सादगी उसे बहुत सरल बनाती थी। उसकी शादी के लिए उसकी बुआ ने ही विक्रांत को देखा था। विक्रांत देखने में काफी सुंदर और सुडौल शरीर का था। सुलोचना से जब विक्रांत के बारे में उसके घरवालों ने पूंछा तो सुलोचना ने वही सरल और पारंपरिक जवाब दिया था कि जैसा आप लोग सही समझे। अगर आप सबको पसंद है तो मुझे भी पसंद है। हालांकि सुलोचना को विक्रांत काफी पसंद आया था लेकिन उसने किसी से विक्रांत की खुले शब्दों से तारीफ नहीं की। सुलोचना की हां मिलते ही घरवालों ने उसकी शादी विक्रांत के साथ तय कर दी।  

    आज सुलोचना शादी के बाद विदा होकर अपने ससुराल आयी थी। उसकी सास बहुत सरल स्वभाव की थी ससुर को उसे अभी परखने का मौका नहीं मिला। लेकिन उसकी ननद तृषा बहुत चंचल थी। वह शादी के पहले से ही जब सुलोचना से बाते करती थी तब उसे बहुत छेड़ती थी। सुलोचना अपने शांत स्वभाव के कारण तृषा की बातों का जवाब नहीं दे पाती थी। 

    सुलोचना अपने घरवालों की याद में खोई थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई और विक्रांत कमरे में दाखिल हुआ। सुलोचना जो बिस्तर पर अधलेटी अवस्था में थी उठ गयी और घूंघट कर लिया। विक्रांत दरवाजे के सामने लगी खिड़की पर जाकर खड़ा हो गया और उदास नजरों से चांद को देखने लगा। हालांकि बाहर आसमान में चांद के अलावा कमरे में भी एक चांद था। बल्ब की दूधिया रोशनी में सुलोचना किसी चांद से कम नहीं लग रही थी। लेकिन विक्रांत ने उसे एक बार भी पलटकर नहीं देखा। सुलोचना के मन में कई सवालों ने उसे घेर लिया। लेकिन सुलोचना ने अपने मन को सम्भालते हुए खिड़की पर खड़े विक्रांत की तरफ देखते हुए पूंछा- कोई समस्या है क्या। "नहीं" विक्रांत ने सुलोचनी की तरफ देखे बिना उत्तर दिया। अब तो सुलोचना को मन एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ और उसका मन और मस्तिष्क आपस में प्रतिद्वन्द करने लगे थे। इस प्रतिद्वन्द का कुछ अर्थ निकलता उससे पहले ही विक्रांत खिड़की हटकर बिस्तर के कोने पर बैठ गया। सुलोचना के मन में विक्रांत की छवि एक आदर्शवादी पति की थी। इसलिए उसे कुछ अनहोनी की आशंका थी कि विक्रांत के साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ। 

    विक्रांत ने सुलोचना को देखा और उसकी तरफ देखते हुए बोला- तुम बहुत खूबसूरत हो। ऐसा लग रहा है जैसे कोई अफ्सरा स्वर्ग से उतर आयी हो। विक्रांत के चेहरे पर अभी भी असमंजस के भाव थे। लेकिन विक्रांत के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर सुलोचना बहुत खुश हुई और बोली- आप भी अच्छे लग रहे है। ऐसा लग रहा था कि विक्रांत सुलोचना से कुछ कहना चाह रहा था लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से करे। सुलोचना ने विक्रांत के मन के भाव पढ़ते हुए बोली- कोई बात हो तो बेफिक्र होकर कह दीजिए। मुझसे संकोच करने की जरुरत नहीं है आखिर अब में आपकी पत्नी हूं और आपके सुख-दुख में साथ देना मेरा फर्ज है। 

    विक्रांत ने थोड़ी देर बाद अपनी बात कहनी शुरु कर दी- सुलोचना मैं जब मैं पांचवी क्लास से पास होकर छठी क्लास में पहुंचा था तो मेरे क्लास में एक लड़की ने एडमिशन लिया था। वह लड़की क्लास मे किसी से बात नहीं करती थी। हम सब क्लास के बच्चे उसका मजाक बनाया करते थे। स्कूल में नया होने की वजह से उसका कोई भी दोस्त नहीं था। एक दिन मैने देखा कि कुछ बच्चे उसे परेशान कर रहे थे। वह इतना परेशान हो गई कि बरामदे में लगे एक खम्भे के पीछे छुपकर रो रही थी। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। और मैने मन ही मन फैसला लिया कि आज के बाद उसे परेशान नहीं करुंगा। फिर हम दोस्त बन गये और क्लास में हमेशा एक-दूसरे के साथ बैठते थे। हम अपना लंच बाक्स शेयर करते थे और हमेशा पढ़ाई में एक-दूसरे का मदद करते थे। उसकी वजह से इस बार पूरी क्लास में मेरी भी अच्छे नंबर आये थे। मै बहुत खुश रहने लगा और मुझे घर से ज्यादा स्कूल में अच्छा लगता था। लेकिन आठवी क्लास पास करने के बाद वह स्कूल नहीं आयी। बाद में पता करने पर जानकारी हुई कि उसके पिता का ट्रांसफर हो गया है। अब वह दूसरे शहर में चले गये है। इस घटना के बाद मैं बहुत उदास हो गया था लेकिन धीरे-धीरे वक्त के साथ मैं बड़ा होता गया और अपनी पढ़ाई पूरा करता गया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैने नौकरी के लिए तैयारी की और जब मुझे नौकरी मिल गई तो मैने उसे ढूढ़ना चाहा लेकिन उसका पता नहीं चल पाया। क्योंकि वह लड़की जहां जाकर बस गयी थी वहां जाकर पता चला कि अब उनका फिर से किसी दूसरे शहर में ट्रांसफर हो गया। मैं अभी उस लड़की को और ढूढ़ना चाहता हूं लेकिन मेरे घरवालों ने मेरी मर्जी के खिलाफ तुमसे शादी कर दी है।और मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। 

    सुलोचना बहुत ही शांति से विक्रांत की बाते सुन रही थी और ऐसा लग रहा था कि वह भी विक्रांत को बातों मे खो गयी है। जब विक्रांत ने उसकी तरफ देखा तो उसे हैरानी हुई। क्योंकि उसे लगा था कि शायद सुलोचना यह सब बाते सुनकर भड़क न उठे। मगर ये क्या सुलोचना तो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। विक्रांत ने सुलोचना को आवाज दी तो सुलोचना ने जैसे ही आंखे खोली उसकी आंखो में आंसू थे और उसने विक्रांत को गले लगा लिया। विक्रांत को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर सुलोचना ये सब क्यों कर रही है। सुलोचना ने विक्रांत को अपनी बाहों से और जोर से भरते हुए कहा- विक्की आई लव यू। विक्रांत का दिल जोरो से धड़क उठा क्योकि इस नाम से केवल वह स्कूल वाली लड़की सुनैना ही बुलाती थी। विक्रांत ने सुलोचना के दोनो कंधे पकड़कर अपने चेहरे के सामने करते हुए पूंछा- क्या तुम सुनैना हो? "नहीं"- बुद्धू। मैं सुलोचना हूं और स्कूल में भी मेरा नाम सुलोचना ही था पर तुम्हारे बदमाश दोस्तो ने मेरा नाम सुलोचना से सुनैना कर दिया था। यह बात मुझे भी बात मे पता चली। 

    जब मैं आठवी क्लास पास हुई थी तब पिता जी का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो जाने के कारण मुझे जाना पड़ा । लेकिन यहां से जाने के बाद मैं भी बहुत परेशान हुई। नया शहर नये लोग मुझे कुछ भी पसंद नही आ रहा था। लेकिन कोई और रास्ता नहीं था। वक्त के साथ सब कुछ धीरे-धीरे भूलती जा रही थी लेकिन तुम्हे नहीं भूल पाई थी। शायद किस्मत को भी हमे मिलाना था इसीलिए पिताजी के ट्रांसफर फिर से इसी शहर में गया और मैं फिर से यह सोचकर खुश हो गई कि फिर तुमसे मुलाकात होगी। लेकिन तुम्हारा कोई अता-पता नहीं था। जहां पर तुम पहले रहते थे वहां का मकान बेंचकर कही दूसरी जगह शिफ्ट हो गये थे। तुम्हारे पड़ोसियों से जानकारी की तो उन्हे भी कुछ पता नहीं था तुम्हारे बारे में। कम से कम अपने पड़ोसियों से तो बताकर जाते- सुलोचना ने विक्रांत को डांटते हुए कहा और हंस पड़ी। दोनो बहुत खुश थे क्योकि उन्हे अपने बचपन का प्यार जो मिल गया था।

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