कमरे के पास पहुंचकर मैं अपनी बैग में चाभी ढूढ़ ही रहा था कि अचानक पीछे से अंकल की आवाज आई, "लगता है आज फिर चाभी गुम हो गई।" मैने मुड़कर पीछे देखा तो अपने हाथ पीछे की तरफ बांधकर अंकल मेरी तरफ ही आ रहे थे। अंकल जी हमेशा ऐसे ही फुर्सत वाली चाल चलते है। मैंने मुस्कुरा कर जवाब दिया,"चाभी गुम नहीं हुई है बस मिल नही रही है।" बड़ी मशक्कत करने के बाद बैग के एक कोने से चाभी मिली और मैने कमरे का दरवाजा खोला।
अंकल जी भी मेरे साथ ही कमरे मे आ गये और दरवाजे के बगल पड़ी हुई कुर्सी मे बैठ गये। मैने बैग एक तरफ रखा और हाथ मुह धोने के लिए बाथरुम चला गया। जब मै वापस आया तो अंकल जी टेबल पर रखे हुए कल के अखबार को पढ़ रहे थे। मै तौलिया लेकर हाथ मुह पोंछने लगा। चाभी कैसे खो गयी थी कल, अंकल जी ने टेबल पर अखबार रखते हुए पूंछा। मैने तौलिये को अपने कंधे पर रखा और बिस्तर पर बैठते हुए कहा, यही तो पता नहीं अंकल जी। कैसे खो गयी और कहां पर खो गयी। मैने बिस्तर पर लेटते हुए दीवार पर टेक लगा दी और आंखे बंद करते हुए कल के बारे में सोचने लगा।
सुबह के पांच ही बजे थे कि अलार्म की आवाज से नींद खुल गई। वैसे मै जब तक अपने घर पर था तब तक मेरी आठ बजे से पहले नींद नहीं खुलती थी लेकिन जब से मै प्रतियोगी परीक्षाओ की तैयारी के लिए लखनऊ आया तब से मेरी जिन्दगी में काफी उथल-पुथल मची हुई थी। लेकिन अब धीरे-धीरे सब शांत होने लगा है। सुबह जल्दी उठना और शाम को देर से सोना और दिन में काम और पढ़ाई का सिलसिला रहता था। बिस्तर से उठने के बाद तरोताजा होकर कोचिंग सेन्टर जाने के तैयार हुआ। कमरे का दरवाजा बंदकर मेन डोर से निकलते हुए सड़क पर आ गया। वहीं नुक्कड़ पर एक चायवाले के पास एक गरमागरम चाय पीकर वही से कोचिंग सेन्टर के लिए रिक्शा पकड़ लिया।
कोचिंग सेन्टर से आने के बाद मेन डोर से होते हुए पहली छत पर बने अपने कमरे पर पहुंचा तो दरवाजे पर लटकते हुए ताले को देखकर मेरे माथे पर शिकन सी पड़ गई। क्योकि जिस जेब मे मै चाभी रखता था मेरा हाथ उसी जेब में था। मै परेशान हो गया और उल्टे कदम बहुत पैनी नजर लेकर चाभी ढूढ़ने उसी रास्ते चल पड़ा। थोड़ी दूर चलने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैने चाभी उसी जेब मे रखी थी जिस जेब में मैं रुमाल रखता था और आज मैने कई रुमाल से अपना मुंह पोंछा, क्योंकि गर्मी बहुत थी। मैं मुंह लटकाकर अपने कमरे की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर भारी कदमाे से बढ़ने लगा। चाभी गुम हो जाने की वजह से ताला तोड़ना पड़ेगा, यह सोचकर मैं मन ही मन अपने आपको कोस रहा था कि,"मै कितना लापरवाह हूं एक चाभी मुझसे नहीं सम्भाली जाती, जिम्मेदारी क्या खाक सम्भालूंगा।" इसी उधेड़बुन में चलते हुए न जाने कब अपने कमरे तक पहुंच गया पता ही नही चला। "अब तो ताला तोड़ना पड़ेगा" बगल के कमरे में रहने वाला लड़का मुझसे बोला।
वह लड़का शायद काफी देर से मुझे देख रहा था। "शायद" मैने बिना उसकी तरफ देखे ही भारी मन से कहा। वह दौड़कर नीचे अंकल जी जो कि मकान मालिक है, उन्हे बुलाने गया। मै दरवाजे के सामने खड़े होकर सिर्फ ताले को घूर रहा था और सोच रहा था कि कोई ऐसा उपाय हो जाये जिससे ताला भी खुल जाये और उसे तोड़ना भी न पड़े। लेकिन ऐसा शायद संभव नहीं था। तब तक वह लड़का वापस आया और उसने कहा कि, "अंकल जी तो है नहीं लेकिन आंटी जी ने यह हथौड़ा दिया है ताला तोड़ने के लिए"। मैने उस लड़के की तरफ देखकर कहा,"तोड़ना जरुरी है क्या, किसी मिस्त्री को बुलाकर भी खुलवा सकते है।" लड़के ने हंसकर मेरी तरफ देखा और कहा,"मिस्त्री, अंकल मेरे दोस्तो को तो बिना आधार कार्ड चेक किए आने नहीं देते।" तुम मिस्त्री की बात कर रहे हो। अगर अंकल जी को यह बात मालूम पड़ गई कि तुमने यहां मिस्त्री को बुलाया था तो तुम्हारा बोरिया बिस्तर उठाकर बाहर कर देंगे।
दरअसल मुझे यहां पर शिफ्ट हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे और वह लड़का काफी दिन से यहां रह रहा था। इसलिए अंकल जी के व्यवहार के बारे मुझसे ज्यादा उसे पता था। मैने एक लम्बी सांस ली और उसकी तरफ देखकर कहा,"तो फिर।" उसने कहा- तो फिर क्या ताला तोड़ देते है। मैने कहा- नहीं यार यह ताला मैं घर से लाया था। इसे तोड़ने का दिल नहीं करता। मेरी भावनाएं इस ताले के साथ जुड़ी है। इसे मेरे पिताजी खुद बाजार से खरीदकर लाये थे। वैसे मेरे पिताजी जल्दी किसी के लिए कुछ खरीदते नहीं है यह सारा काम मेरी मां करतीं है। मेरे पिताजी का स्वभाव बिल्कुल नारियल के जैसा है ऊपर से सख्त और अन्दर से नरम बिल्कुल मक्खन जैसा। मैने लखनऊ जाने के बारे में जिस दिन सबको बताया था उस दिन मेरी मां के साथ मेरे पिता का भी चेहरा सुर्ख था। हालांकि लखनऊ में पढ़ाई करने का फैसला मेरे पिताजी का ही था।
मेरे चेहरे पर चुटकी बजाते हुए उस लड़के ने कहा कि,"कहां गुम हो गये भाई।" मैने ना में सिर हिलाया और बोला कहीं नहीं यार। बात दरअसल भावनाओ के साथ पैसो की भी थी क्योकि यह ताला काफी महंगा और अच्छा था और दूसरा ताला लेने के लिए पैसे भी जुटाने होंगे। घर से पढ़ाई के लिए जो पैसा मिलता है उसके अलावा यहां थोड़ा बहुत काम करना पड़ता है तब जाकर कहीं पढ़ाई, कमरे का किराया और खाने-पीने का खर्च निकलता। इसके अलावा अगर महीने में कोई परीक्षा आ गई तो अलग से पैसा मैनेज करना पड़ता था।
लेकिन काफी सोच-विचार करने के बाद ताले का हल नहीं निकला। ताला तोड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। मैने उस लड़के के हाथ से हथौड़ा लिया और ताला तोड़ने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन उस लड़के ने शायद मेरी मन:स्थिति पढ़ ली और मेरे हाथ से हथौड़ा लेकर कहा, "तुम पीछे हटो, तुमसे न हो पायेगा।"
शायद उस लड़के ने सही कहा, क्योकि उस ताले को तोड़ने के लिए मुझमे जरा सी भी हिम्मत न थी। उस लड़के ने हथौड़े को हवा मे उठा लिया और ताले पर एक जोरदार प्रहार किया। मै शून्य निगाहो से उस ताले को देख रहा था ताला टूट चुका था। उस लड़के ने धक्का देकर दरवाजा खोल दिया। उस लड़के ने ताले को उठाकर डस्टबिन मे ड़ालना चाहा लेकिन मैने उसका हाथ पकड़ लिया और ताले को अपने पास रख लिया।
मै अपने कल के ख्यालो में खोया ही था कि अंकल जी ने मुझे आवाज दी,"सो गये क्या"। मैने आंखे खोली तो देखा कि अंकल जी मेरे सामने कुर्सी पर बैठे थे। मैने उठकर अंगड़ाई ली और अंकल जी से पूंछा,"चाय पिएंगे अंकल जी।" अंकल जी ने कहा कि नेकी और पूंछ-पूैछ।फिर हम लोगो ने चाय की चुस्की लेते हुए उस ताले के बारे मे ढेर सारी बाते की। वह ताला आज भी मेरे साथ है एक खूबसूरत याद की तरह।

0 Comments