"कृतिका" कहां हो तुम। अचानक नीचे से मां की आवाज आई। छत पर पानी की टंकी के पास बैठकर फोनकर से बात करती हुई कृतिका अचानक हड़बड़ाकर बोली- हां मां, मैं यहां छत पर हूं। कृतिका ने फोन रखते हुए कहा कि- मैं तुमसे बाद में बात करती हूं। अभी मैं नीचे जा रही हूं मां बुला रही है। इतना कहकर कृतिका फोन रखकर नीचे आ गई। नीचे पहुंचते ही मां बोली- स्कूल से आने के बाद हाथ-मुंह धोकर सबसे पहले खाना खा लिया करो। उसके बाद ही कही जाया करो। अब तुम बड़ी हो गयी हो अपनी जिम्मेदारियों समझा करो। कृतिका ने अपना सिर खुजाते हुए कहा- ठीक है मां। कृतिका पिछले कुछ दिनों से खोई-खोई सी रहने लगी थी उसे खाने की भी सुध नहीं रहती थी। कभी-कभी वह अपना लंच भी नहीं करती थी। इसके लिए उसे मां से बहुत डांट भी सुननी पड़ती थी।
कृतिका को हाईस्कूल की परीक्षा पास किये एक साल बीत चुका था अबकी बार उसने इण्टर में प्रवेश लिया था। हाईस्कूल की परीक्षा उसने अच्छे नम्बरों से पास की थी। क्लास में उसकी अच्छी रैंक थी। कृतिका देखने में काफी सुन्दर थी। उसे अभी 18 वर्ष पूरे करने में कुछ महीने शेष थे। पूरी क्लास में उससे सुन्दर लड़की कोई नहीं थी। इसलिए उसके क्लास में उसके काफी दोस्त थे। सब उसे पसंद करते थे। कृतिका खूबसूरत होने के साथ बुद्धिमान भी थी इसलिए वह क्लास मानीटर भी थी।
कृतिका का व्यवहार पहले ऐसा नहीं था। कृतिका पहले अपना लंच समय से करती थी और स्कूल से घर आते-आते उसे भूख भी लग जाती थी। लेकिन आजकल उसे ठीक से भूख भी नहीं लगती थी और पढ़ाई के प्रति भी काफी उदासीन रहने लगी थी। कृतिका भी अपने बदलते व्यवहार को समझ नही पा रही थी आखिर यह सब क्यों हो रहा था क्यों उसे भूख नहीं लगती, क्यों उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। कृतिका अपने आप से सवाल करती, क्या इन सबकी वजह राघव है। उसे मिले हुए अभी कितने दिन हुए है। अभी तो में उसे ठीक से जानती भी नहीं हूं। अगर उस दिन सर मुझसे पूरे क्लास की कापी चेक करने को नहीं कहते तो शायद उससे कभी बात भी न होती। राघव को इस स्कूल में आये हुए पूरे एक साल हो चुके थे लेकिन राघव का सेक्शन अलग था। इसलिए कृतिका की कभी राघव से मुलाकात नहीं हुई। हां वह उसे कभी-कभार प्रार्थना सभा और खेल के मैदान में जरुर देखती, लेकिन अन्य बच्चों की भांति जिन्हे वह नहीं जानती उसकी तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। लेकिन कापी चेक करते समय राघव की कापी तो ठीक तरह से पूरी लिखी हुई थी लेकिन फटी हुई थी और मैने यह बात सर को बता दिया जिससे उस दिन उसे सर ने काफी डांटा था।
लेकिन बाद में मुझे काफी बुरा लगा था और मैने जब राघव से इस बारे में बात की तो उसने कहा कि- ऐसी छोटी-मोटी बाते तो होती रहती है इसमें बुरा मानने वाली कौन सी बात है। मुझे राघव की बाते पसंद आई और फिर उससे दोस्ती हो गई। राघव से बाते करते-करते कब लंच बीत जाता पता ही नहीं चलता और कभी-कभी लंच खतम भी नहीं होता क्योंकि बातों से ही पेट भर जाता। पापा जी ने मुझे एक छोटा कीपैड दे दिया था ताकि कभी कही अकेले जाना या रहना हो तो समय पर काम आये। पिछले महीने मैं तबियत खराब हो जाने के कारण तीन-चार दिन स्कूल नहीं गई थी। तभी राघव ने मुझसे मेरा फोन नम्बर मांगा था और मैने उसे बिना किसी हिचकिचाहट के नम्बर दे दिया था। इसलिए जिस दिन हम स्कूल में नहीं मिलते तो फोन पर बात कर लेते थे। लेकिन पिछले कुछ दिनों से स्कूल से आने के बाद भी बात होने लगी थी इसलिए खाने की भी फिक्र नहीं रहती।
नवम्बर का महीना बीत रहा था और दिसम्बर आने वाला था। सर्दियों के कपड़े लोगो ने अलमारियों से निकाल लिये थे। बोर्ड परीक्षा में अब ज्यादा दिन शेष नहीं थे। फरवरी में इम्तिहान होने का आदेश आ गया था। और मैने इस साल ज्यादा पढ़ाई भी नहीं की थी। मुझे इम्तिहान में फेल हो जाने का डर सताने लगा। उस दिन स्कूल में वह जब लंच कर रही थी तब राघव भी अपना लंच बाक्स लेकर वहां आ गया और कहा- कहां व्यस्त रहती हो आजकल बात करने का भी समय नहीं मिलता। कृतिका बिना किसी बात का जवाब दिए चुपचाप अपना लंच कर रही थी। लेकिन राघव को तो जैसे भूख ही नहीं लगी थी वह कृतिका से जानना चाह रहा था कि वह पिछले कई दिनों से उससे बात क्यों नहीं कर रही है। स्कूल मे भी वह उसे इग्नोर कर रही थी। हालांकि कृतिका उसकी किसी भी बात का जवाब नहीं देना चाहती थी। लेकिन राघव उससे बिना बात किए आज मानने वाला भी नहीं था। राघव बोला - कृतिका तुम्हे मेरी बात का जवाब तो देना ही पड़ेगा। क्यो अचानक तुमने मुझसे बात करना बंद कर दिया।
कृतिका ने राघव से कहा- देखो राघव तुमसे बात करने की वजह से मेरी पढ़ाई बहुत डिस्टर्ब हो रही है और मै नहीं चाहती कि मैं इण्टर की बोर्ड परीक्षा में फेल हो जाऊं। इसलिए अब ज्यादा बात करना न मेरे लिए अच्छा है और न तुम्हारे लिए। राघव का चेहरा उदास हो गया था और उसने धीरे से कहा - ठीक है जैसा तुम कहो। हालांकि तुमसे बात करना मेरी आदत बन गयी है लेकिन फिर भी मैं खुद पर नियंत्रण रखने की कोशिश करुंगा। इतना कहकर राघव अपना लंचबाक्स लेकर कृतिका से दूर जाकर बैठ गया। आज कई दिनों के बाद उन्होने अलग होकर लंच किया था।
धीरे-धीरे इम्तिहान की तारीख नजदीक आ रही थी कृतिका अपनी पढ़ाई में इतनी मशगूल हो गई कि अब वह राघव से बात करना दूर की बात वह उसकी तरफ देखती भी नहीं थी। राघव को पहले तो बहुत अजीब लग रहा थी लेकिन धीरे-धीरे सब उसके लिए भी नार्मल हो गया था वह भी अब पढृाई को समय देने लगा था। राघव और कृतिका के साथ क्लास के अन्य बच्चों ने अच्छे से तैयारी करके इम्तिहान दिया।
कुछ दिन बाद जब इम्तिहान का रिजल्ट आया तो कृतिका के क्लास के सभी बच्चे पास हो गये थे लेकिन राघव और कृतिका अच्छे नम्बरों से पास हुए थे। कृतिका ने राघव को फोन लगाया और बधाई दिया। राघव जो कि यह मान चुका था कि अब कृतिका फिर कभी उसे फोन नहीं करेगी, लेकिन कृतिका के फोन ने उसकी गलतफहमी दूर कर दी थी। राघव को अब कृतिका के फैसले पर फक्र हो रहा था कि और उसने हंसते हुए कहा- अच्छी जी, तो आपने यह सब इम्तिहान के लिए किया था और फिर दोनो हंसने लगे थे। कृतिका आज फिर वही छत पर पानी की टंकी के पास खड़े होकर बात कर रही थी। राघव और कृतिका की दोस्ती पहले से और भी ज्यादा मजबूत हो गई थी।

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