शाम के साढ़े पांच बज रहे थे। आफिस में आज काम ज्यादा था। काम वैसे तो रोज ही ज्यादा होता है लेकिन आज रोज वाले काम से भी ज्यादा था। मेरी हमेशा से आदत रही है कि काम को समय से पहले खत्म करने की लेकिन जब काम ही इतना ज्यादा हो तब कोई रास्ता नहीं बचता सिवाय काम को कल पर टालने के लिए। भारत की अधीनस्थ अदालतों में काम हमेशा ओवरलोड होता है दिन खत्म हो जाता है लेकिन काम नहीं खत्म होता।
दिसम्बर का महीना चल रहा है। सुबह धूप देर से निकलती और शाम को जल्दी ही सूरज बादलो की ओट में चला जाता। सूरज दिनभर धरती के साथ आंख मिचौली खेलता रहता। आज मौसम काफी सर्द था। सुबह ड्रेस में सर्दी वाले कपड़े कोट पैण्ट पहनकर आफिस के लिए निकले। धूप हल्की सी निकल आयी थी लेकिन मोटर साइकिल में हल्की ठण्ड लग रही थी। आफिस में दिनभर काम किया। दोपहर में लंच के वक्त थोड़ी देर धूप सेंकने के लिए आफिस के पीछे की तरफ आधे घण्टे तक बैठे रहे। शाम को आफिस का काम खत्म करने के बाद अण्डर ग्राउण्ड पार्किंग से अपनी मोटर साइकिल निकाल कर गेट नम्बर 2 से निकला। आफिस से निकलकर जिलाधिकारी महोदय के बंगले की तरफ से होकर घर जा रहा था। ठण्ड ज्यादा होने की वजह से मै गाड़ी धीरे चला रहा था कि रास्ते में देखा कि एक बुजुर्ग ठण्ड से काफी सिकुड़कर बैठे हुए थे। उनके पास ठण्ड से बचने के लिए मात्र धोती कुर्ता और एक हल्की सी सदरी थी।
मैने उन्हे देखकर अपनी गाड़ी रोक दी और उनके पास गया। उन्हे इस ठण्ड में ठिठुरता देखकर मुझसे रहा न गया और मैने अपना कोट उतारकर उन्हे पहना दिया। हालांकि ठण्ड ज्यादा होने के कारण जैसे ही मैने कोट उतारा मुझे भी ठण्ड लगने लगी। लेकिन उन्हे कोट पहनाने के बाद उस बुजुर्ग की दुआओं ने मेरे भीतर गर्माहट पैदा कर दी।
उस बुजुर्ग से आशीर्वाद लेने के बाद मैं अपने घर आ गया।

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